Fri, 06 Nov 2026
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: नई दिल्ली राज्यसभा में डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने फर्जी जाति प्रमाण पत्रों की बढ़ती समस्या पर गहरी चिंता व्यक्त की, आदिवासी समाज के हक और अधिकारों की रक्षा हेतु देशव्यापी सख्त कार्रवाई की मांग*

नई दिल्ली राज्यसभा में डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने फर्जी जाति प्रमाण पत्रों की बढ़ती समस्या पर गहरी चिंता व्यक्त की, आदिवासी समाज के हक और अधिकारों की रक्षा हेतु देशव्यापी सख्त कार्रवाई की मांग*
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*राज्यसभा में डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने फर्जी जाति प्रमाण पत्रों की बढ़ती समस्या पर गहरी चिंता व्यक्त की, आदिवासी समाज के हक और अधिकारों की रक्षा हेतु देशव्यापी सख्त कार्रवाई की मांग* बड़वानी:- राज्यसभा में आज शून्यकाल के दौरान मध्यप्रदेश से भाजपा के राज्यसभा सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने देश के विभिन्न राज्यों में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति समुदायों के नाम पर बनाए जा रहे फर्जी जाति प्रमाण पत्रों की लगातार बढ़ती समस्या को अत्यंत गंभीर मुद्दे के रूप में सदन के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि फर्जी प्रमाण पत्रों के माध्यम से आदिवासी समाज के वास्तविक हक और अधिकारों को छीनने की यह प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है, जो अब चिंताजनक स्तर पर पहुँच चुकी है। डॉ. सोलंकी ने अपने वक्तव्य में कहा कि संविधान ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के नागरिकों को सामाजिक न्याय दिलाने और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था बनाई है। उन्होंने बताया कि इस व्यवस्था को कुछ स्वार्थी तत्व फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर कमजोर कर रहे हैं, जिससे आरक्षण का उद्देश्य प्रभावित हो रहा है। उन्होंने सदन को अवगत कराया कि सरकारी जांच समितियों और राज्य स्तरीय सत्यापन प्राधिकरणों ने अनेक राज्यों में बड़ी संख्या में प्रमाण पत्रों को जाली पाया है। शिक्षा के क्षेत्र से लेकर सरकारी सेवाओं तक, आरक्षित सीटों और पदों पर नकली आदिवासी बनकर अयोग्य लोगों के काबिज होने की घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं। उन्होंने कहा कि इसका सबसे बड़ा नुकसान उस गरीब और योग्य छात्र को होता है जिसके लिए आरक्षण व्यवस्था बनाई गई थी। जब कोई फर्जी व्यक्ति आरक्षित सीट पर दाख़िला लेता है या किसी नौकरी पर नियुक्त हो जाता है तो वह सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि किसी हकदार का भविष्य छीन लेता है। उन्होंने बताया कि कई मामलों में फर्जी प्रमाण पत्र पकड़े जाने के बाद भी कार्रवाई में देरी होती है और दोषी व्यक्ति वर्षों तक पद व वेतन का लाभ उठाता रहता है, जो संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। अपने गृहप्रदेश मध्यप्रदेश की स्थिति का उल्लेख करते हुए डॉ. सोलंकी ने कहा कि विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार जाली प्रमाण पत्रों के माध्यम से नौकरी पाने के 232 मामलों की जांच चल रही है, जबकि कुल मिलाकर 8000 से अधिक फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के मामले लगभग 20 वर्षों से छानबीन समिति के पास लंबित हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है और समाज में इस मुद्दे को लेकर कई बार रोष भी व्यक्त किया गया है, क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर उनके अधिकारों का हनन हुआ है। डॉ. सोलंकी ने अपने वक्तव्य में सुप्रीम कोर्ट की उस स्पष्ट टिप्पणी का भी उल्लेख किया जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर प्राप्त की गई नौकरी या शैक्षणिक प्रवेश मान्य नहीं माना जाएगा और ऐसे मामलों में दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई तथा सेवा से बर्खास्तगी अनिवार्य होनी चाहिए। उन्होंने सदन को यह भी अवगत कराया कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और दिल्ली सहित अनेक राज्यों में इस प्रकार के मामलों की संख्या लगातार समाचार माध्यमों के जरिए सामने आ रही है, जो पूरे देश के लिए चिंता का विषय है। डॉ. सोलंकी ने सरकार से विनम्र आग्रह किया कि इस विषय को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए पूरे देश में प्रभावी और कड़ाई से लागू होने वाली जाति प्रमाण पत्र सत्यापन व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आरक्षण का लाभ केवल उन्हीं वास्तविक और पात्र नागरिकों तक पहुँचे, जिनके लिए यह संवैधानिक व्यवस्था बनाई गई थी। उन्होंने अंत में कहा कि आरक्षण कोई कृपा नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है, और इस अधिकार की रक्षा करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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